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गुजारिश (कीर्ति चौहान)


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‘काश मैं वेश्या होती’

Posted On: 14 Nov, 2013  
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social issues में

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शिष्य को मोक्ष कैसे मिले जब गुरु ऐसा हो !!

Posted On: 4 Sep, 2013  
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social issues में

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मेरे पास इन सवालों का जवाब नहीं

Posted On: 20 Apr, 2013  
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ममदू की नीयति है सो वो बीन रहा है..

Posted On: 17 Feb, 2013  
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सच है कि वो महिला ‘तू’ नहीं है….!!

Posted On: 4 Jan, 2013  
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माथे पर सिंदूर और लाल चुनरी अब कोई नहीं ओढ़ाएगा

Posted On: 1 Jan, 2013  
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राजनीतिक गलियारे, मीडिया और आक्रोश

Posted On: 31 Dec, 2012  
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पल भर का अहसास

Posted On: 18 Dec, 2012  
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Others मेट्रो लाइफ में

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

महोदया ,आप के लेख में ही आप का उत्तर निहित है.यहाँ सोच की आज़ादी का मतलब यह है की हर नारी को ..दिव्या ..की वैश्या की राह पर .चलना चाहिए.यह आज़ादी नहीं सोच की विकृति है.जहाँ तक ..आज़ादी का प्रश्न है ..... आज़ादी का यह मतलब नहीं कि हर सीमा का अतिक्रमण किया जाय.नर हो या नारी....उसे आज़ाद पशु की तरह विचरण की आज़ादी नहीं होनी चाहिए.पशुओं की स्वच्छंदता भी घातक हो सकती है.जहाँ तक ...सुरक्षा का प्रश्न है....यदि हर औरत ...अबला से सबला हो जाय ..तो ,पुरुषों को स्वयं ही महिलाओं की सुरक्षा घेरे में रहना पड़ेगा.बाबा रामदेव .....जब स्वयं अपनी सुरक्षा नहीं कर सके तो ...महिलाओं की सुरक्षा घेरे में ही अपने को सुरक्षित कर पाये .

के द्वारा: omdikshit omdikshit

महिलाओं का यह रूप देखने के बाद मर्दवादी समाज को यह लगने लगता है कि महिलाओं से तन का सुख पाना बड़ी ही आसान बात है और जब कभी-कभी उसे इस सुख की प्राप्ति नहीं हो पाती है तो इंसानियत की सभी हदें पार कर किसी भी मासूम लड़की को अपना शिकार बना लेता है. हो सकता है कि आपको मेरी बातें थोड़ी असहज और अजीब या फिर हैरान कर देने वाली लग रही हों पर एक बार ध्यान से सोचिए क्या कोई भी संविधान या कानून रेप जैसी घटनाओं को रोक सकता है, नहीं ! इसके लिए मानसिक स्तर पर परिवर्तन करना होगा और यही वो रास्ता है जो मर्दवादी समाज को यह सोचने के लिए मजबूर करेगा कि महिलाएं सिर्फ उपभोग की वस्तु नहीं है जिससे शारीरिक सुख उसकी कीमत लगाकर या फिर जोर जबरदस्ती के साथ प्राप्त किया जा सकता है, सही सवाल उठाये हैं आपने अपने लेख में !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

आज जिसे देखे आंसू बहाते दिखाए दे रहा है लेकिन ये ज्यादातर वही लोग है जो टी.वी. में आना चाहता है या पेपर में तश्वीर खिचाना चाहते है | जबकि देश के ज्यादातर लोगों को इन सब बातों से कोई मतलब नहीं है और केवल १-२ प्रतिशत लोग ही है इस घटना के बारे में कुछ सुनना चाहते है | आज जिसे देखो पूरी दुनिया के सभी पुरूषों को दुष्कर्म के दोषी मान रहे है जैसे की सभी पुरूष दुष्कर्मी है| लेकिन क्या दिल्ली की वे महिलाए इस दुष्कर्म के बाद की घटना के लियॆ दोषी नहीं है जो उस लड़की को खून से लतपथ देखकर भी रुके नहीं और अपनी शानदार गाड़ियों में बैठकर अपने-अपने घर को चली गयी या किसी अन्य लड़की को परेशानी में देखकर मुह मोड़ लेती है | सच तो यह है देश की ज्यादातर महिलाए ही महिलाओ से नफ़रत करती है और उन्हें कमजोर और असहाय देखना चाहती है जबकि पुरुष महिलाओं की मदद करते है और आज पुरुषो को भी महिलाओं द्वारा घरों और कार्यालयों में प्रताड़ित किया जाता है और मानसिक एवं शारीरिक शोषण किया जाता है | यह खूब प्रचारित किया जा रहा है औरत के द्वारा ही सभी जन्म लेते है लेकिन यह नहीं कहते की उस जन्म में और उस इन्सान बड़ा करने में पुरुष का भी बड़ा योगदान होता है और यह योगदान स्त्री के योगदान से कतई कम नहीं होता है | समाज में सभी तरह के लोग होते है | कुछ पुरुष बुरे भी होते है और कुछ महिलाएं भी बुरी होती है | जिस तरह से महिलाओं ने अपने बारे दुखद माहौल बनाकर अपने पक्ष पुरुषों के खिलाफ क़ानून बनवा लिए है वह काबिलेतारीफ है और कमाल की बात यह है कि वे क़ानून परुषों के द्वारा ही बनाए गए है | अब इस तरह के सभी कानूनों का दुरुपयोग देखना हो तो सरकारी कार्यालयों में जाए जहां पर महिला कर्मचारी शायद ही कुछ हों जो अपने कार्य एवं दिए गए दायित्व का निर्वाह करती हो या समय पर कार्यालय में उनके दर्शन होते हों | ऊपर अधिकारी भी उंसे खौफ खाते क्योकि उन पर काम करने का दबाव डालते ही महिलाएं धमकी पर उतर आती है आप सभी जानते है की उसके आगे सभी मजबूर हो जाते है | ज्यादातर महिलाए मुफ्त में तनख्वाह लेती है | तो इस सब बात का दोषी कौन है भाई ? जाहिर है महिलाए ही दोषी है और वे अपने आप को दोयम दर्जे का साबित कर रही है | ऐसे बहुत से मामले है जहां महिलाओं ने पुरुषों को किसी अन्य कारण से सबक सिखाने के लिए अपने साथ दुष्कर्म करने का आरोप लगाकर सलाखों के अन्दर पहुचाया है | ऐसे अभी-अभी दो मामले प्रकाश में आये है, एक मामला राजस्थान का है (यह मामला दास्ताने जुर्म में ई-टी.वी. में दिखाया गया है) और दूसरा मामला मऊ (ऊ. प्र.) जिले का है | दोनों ही मामलों में लड़की ने गलत ढंग से ३-४ पुरूषों को जेल अन्दर पंहुचा दिया और बाद में जब जाच हुई और सच सामने आया तो सभी के होश उड़ गए | सैकड़ो ऐसे मामले होते रहते है लेकिन जानकारी में नहीं आते है | तो क्या ऐसे मामले में किसी लड़की के लिए उम्रकैद या उससे बड़ी सजा का प्रावधान नहीं होना चाहिए जो की कई पुरुषों की जिन्दगी तवाह कर रहा है ? लेकिन इसकी कोई पैरवी नहीं करता है और जो आवाज़ उठाता है उसे महिला विरोधी कहकर दबा दिया जाता है | आज ज्यादातर विवाहित पुरुष घरो में महिलाओं द्वारा गुलाम बनाए गए है और क्या इसके लिए महिलाए दोषी नहीं है | क्या इसके खिलाफ भी कोई क़ानून नहीं बनना चाहिए जो ऐसी महिलाओं को सजा दे जो पुरुषो का भयंकर मानसिक शोषण कर रही है | और मेरे विचार से महिलाओं द्वारा किया गया ऐसा शोषण ही पुरूषों बाहर की उग्र बनाता है और बलात्कार जैसे दुष्कर्म को बढ़ावा देता है | आज जो कोई भी महिलाओं के पहनावा को सुधारने के बारे में बात करता है उसकी आवाज को दबा दिया जाता है लेकिन यह बात सही नहीं है यदि महिलाओ को पुरुषो के पहनावे के बारे में कहने का हक़ है तो वही हक़ पुरुषो को भी होना चाहिए | आज यदि कोई महिला ऐसे कपड़े पहने जिससे उसके अन्तरंग दिखे तो उसे सराहा जाएगा और लेकिन यदि कोई पुरुष अपना अन्तरग दिखाए तो यही महिलाए शोर मचाकर उस पुरुष को बेशर्म कहेगी और जेल की हवा खिला देगी | ऐसा अंधापन और दोगलापन इस समाज में क्यों है और क्या यह न्यायोचित है और इसे बढ़ावा क्यों दिया जा रहा है ? सच कहे तो कुछ बुद्धिमान पुरुष ही कुछ न कुछ जतन करके (जैसे फैशन शो, मूवी में कम कपड़े पहनाकर आदि) महिलाओं के कम कपड़े पहनने को बढ़ावा दे रहा है और तारीफ कर रहा है ताकि वह महिला के अन्तरंगो को खुलेआम सड़को पर देख सके और महिलाएं भी इस भ्रम को नहीं समझ पा रही हो और इसे फैशन के नाम वैसा ही कर रही है अपने स्त्रीवत्व को नष्ट कर रही है | आज लडकिया भी कम नहीं है वे भी कम कपड़े पहनना और आकर्षक मेकअप भी तो अपने किसी ख़ास पुरुष को आकर्षित करने लिए कर रही है लेकिन होता यह है सड़कों पर केवल उसका ख़ास साथी ही तो होता नहीं है बल्कि और भी पुरुष होते है और यही से गड़बडी शुरू हो जाती है | कुल मिलाकर मै यह कहना चाहता हूँ किसी का भी बलात्कार नहीं होना चाहिये जैसा महिलाओं का हो रहा है और न ही किसी का शोषण होना चाहिए जैसा पुरुषों का हो रहा है | मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है अत: समाज में जैसे रहना चाहिए वैसे ही रहे न की पशुओ की भाति जबकि आजकल स्त्री हो या पुरुष सब पशु जैसे बनाने का प्रयास करते रहते है और गड़बडी कर देते है | इसलिये ऐसे मामले को पूरे परिपेक्ष्य में देखना चाहिए, न की एक घटना की भयावहता से भयभीत हो उलटे – पुल्टे काम करने चाहिए |

के द्वारा:

मैं शायद अब एक सुहागन जैसी मौत नहीं मर पाऊंगी…वो ही सफेद रंग की साड़ी में मेरी लाश को लपेटा जाएगा पर फिर भी अंतिम इच्छा यही है कि मेरी शादी के जोड़े में ही मेरे शरीर का दाह संस्कार किया जाए भले ही मांग में सिंदूर ना लगाया जाए पर अपने पति के साथ जिस जोड़े को पहनकर मैंने सात फेरे लिए थे उसी जोड़े में मैं अंतिम सास लूं.” इन बातों को सुनने के बाद मैं यही सोचती रही कि शायद उसकी बातें यह मर्दवादी समाज भी समझ पाता तो वो यह जान पाता कि कैसे एक नारी पति के मरने के बाद भी उसे जीवित बनाए रखती है. आज भी इन बातों का जवाब समाज के पास नहीं है कि क्यों पति के मरने के बाद औरत के अस्तित्व का भी दाह संस्कार हो जाता है. ये भारतीय परंपरा है और इसमें कुछ बुरा या गलत भी नहीं है ! आप शायद पुरुष सत्ता को चुनौती देना चाह रही हैं अपने लेख में ! लेकिन अगर हम हर बात को criticise करेंगे तो रिश्तों को बचाना मुश्किल हो जायेगा !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: डॉo हिमांशु शर्मा (आगोश ) डॉo हिमांशु शर्मा (आगोश )

कीर्ति जी,नरेन्द्र भाई किसी की स्वीकारोक्ति के मोहताज नहीं है,यह उनका काम है जो तमाम झूठे आरोपों,और उन्हें दोषी साबित करने में जुटी झूठे सेकुलरों की भेडचाल में भी शिखर पर चमक रहा है,नीतीश कुमार हों या मोदी जी का विरोध कर रहा कोई भी छुटभैया नेता,सब मोदी जी का विरोध इसलिए ज्यादा करते हैं क्यूंकि एक बार मोदीजी को मौका मिला तो सारी अवसरवादी राजनीति धराशायी हो जाएगी.लेकिन मेरा निजी तौर पर यह मानना है की अगर इस बार सुषमा स्वराज या दूसरा कोई प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनता है तो यह राजग के लिए अच्छा होगा,क्यूंकि आपकी चिंता वाजिब है की मोदी जी को उम्मीदवार बनाते ही कांग्रेस को अल्पसंख्यक वोटों और उनकी पैरोकारी करने वाले क्षेत्रीय दलों को लामबंद करने का अवसर मिल जाएगा.बहुत स्पष्ट और उत्तम आलेख.

के द्वारा: rahulpriyadarshi rahulpriyadarshi

कीर्ति जी....सच में भाई बहन का ये बंधन अनूठा ही होता है ...मुझे याद है जब मेरी बिटिया बहुत छोटी थी ,उसकी शरारतो पर एक दिन मैंने जैसे ही हाथ उठाया .उसी समय मेरा बेटा कमरे में अन्दर आ रहा था दौड़कर उसने मेरा हाथ पकड़ लिया .अरे आप इस पर कैसे हाथ उठा सकते हो .कोई जरुरत नहीं इसके ऊपर हाथ उठाने की .....कितनी सुन्दर प्यारी सी गुडिया है और आप......और वो कमरे से बाहर चला गया था ! आज भी मेरी गुडिया अपने भाई के उस सच में स्नेह को नहीं भूलती ! एक दिन भी वो कही चला जाये तो लगता है उसकी जान निकल गई ! सच में कितना गहरा रिश्ता है भाई बहन का ,.जब बहन भाई से उम्र में छोटी होती है तो भाई उसे ऐसे प्यार करता है जैसे भाई नहीं पिता हो..!

के द्वारा: D33P D33P

के द्वारा: ajaykr ajaykr

के द्वारा: jagojagobharat jagojagobharat

के द्वारा: kirtichauhan kirtichauhan

कीर्ति जी , हम दिमागी रूप से अक्ल विहीन लोग है ,जो सुन लिया उसे मान लिया , भ्रस्ताचार इससे पहले की सरकारों के शासन में भी हुआ , हमे इसे एक उपलब्धि के रूप में लेना होगा की मनमोहन जी के कार्यकाल में उन पर सही रूप में कारवाई और नाम उजागर हुआ , हमे इसे उपलब्धि के रूप में लेना चाहिय , जब अन्ना टीम ने एक सामाजिक असुंतलन पैदा कर रखा था तो मनमोहन जी ने किसी भी इमरजेंसी की संभावना को समाप्त कर बड़े शांत रूप में राजनेतिक कुशलता से शांत किया ! अभी पुर विश्व में वैश्विक मंदी है ,इस तरह आप भारतीय अर्थव्यवस्था की कमजोरी का जिम्मा भी मनमोहन जी पर थोप नहीं सकते पर उनमे निहित कुछ खामियों से इनकार नहीं किया जा सकता , अगर वो अंडर अचीवर” प्रधानमंत्री है तो आप पुरे विश्व में एक नेता नहीं ढूंढ़ सकते जो अचीवर” हो सायद मुझे इन व्यक्तव्यों से कोई कांग्रेसी भी मान बैठे पर मेरा ये निजी आकलन है

के द्वारा: Chandan rai Chandan rai

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कीर्ति जी, मैं आपकी कुछ बातों से सरोकार नहीं रखता। ऐसा नहीं है, कि मैं पुरूष हूं तो पुरूष की मानसिकता के दबाव में आकर कुछ कह रहा हूं। बल्कि हकीकत यही है कि एक महिला ही अपनी बेटी को बार-बार याद करती है कि वह पराई है और उसे शादी के बाद पराये घर जाना पड़ेगा, इसके साथ-साथ बहुत सारी बातें जैसे दहेज को लेकर सबसे ज्‍यादा ताने एक सास ही मारती है और बेटा न होने पर भी वो ही सबसे ज्‍यादा को‍सती है। ऐसे बहुत सारे उदाहरण में आपके समक्ष रख सकता हूं, जबकि कभी कोई पिता यह नहीं कहता कि वह परायी अमानत है। शायद आप भी मेरी कुछ बातों से सरोकार  न रखें,  ऐसा होना स्‍वाभाविक है। वैसे सुंदर और सटीक लेख के लिए बहुत बहुत बधाई। लिखते रहे।

के द्वारा: Dr. Gajendra Pratap Singh Dr. Gajendra Pratap Singh

के द्वारा: phoolsingh phoolsingh




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